शुक्रवार, 26 दिसंबर 2014

लबादे !

काश ! 
हम सीधे सादे 
अपने मूल रूप में, जी पाते , 
शायद हम 
विवशता में ओढ़ते हैं खोल 
तरह तरह के लबादे ! 
जब हम मूल रूप में होते हैं 
शायद ,हमें हमारा 
नंगेपन का बोध सालता है ! 
आदमी अपने घिनोनेपन पे 
परदे डालता है ! 

द्वन्द मुक्त योगी

यह जग केवल भावना ,किसने जाना सत्य 
परमार्थ भी भाव है ,यह आत्म तत्त्व ही नित्य !
निश्चय भाव सब आत्मा ,जब होता है व्याप्त !
मैं हूँ या हूँ नहीं ,होते भेद समाप्त !!

द्वन्द मुक्त योगी सदा ,शांत करे विश्राम !
अर्थहीन उसके लिए ,धर्मं ,मोक्ष व काम !!

सार्थकता

आप अकूत सम्पदा के स्वामी हैं 
यह आपकी पहचान हो सकती है 
आपकी पहचान आपका अस्तित्व नहीं हो सकता . 
आपके सम्मुख महत्वपूर्ण 
आपका स्वाभिमान नहीं हो सकता . 
आपमें 
आपका अपनापन 
जिसे आप सब में बाँटते हैं 
वही बताता है
आप हो
अन्यथा
आपकी प्रसिद्धी हो सकती है -
लोकप्रियता हो सकती है ,
किन्तु -सार्थकता
आपके अपनेपन में है
आपके कुबेरपन में नहीं .

रविवार, 21 दिसंबर 2014

"भूख"

मै ठिठक गया ,
चारोँ ओरे खड़ी भीड़ के मध्य ,
देखकर एक बच्ची को.
विचार से सयानी ,
देह से कच्ची को .
पंद्रह फुट ऊँची रस्सी पर,
एक बांस के सहारे ,
निर्द्वंद चलते हुए ,
संतुलन के सहारे ,
मौत को छलते हुए ,
बांस के एक छोर बंधी हुई भूख है .
दूसरे छोर पर ,
लटक रही मौत है .
साधुवाद देता हूँ,
उसके इस विश्वास को ,
कि जो -
आसमान में पेट और मौत का ,
संतुलन नहीं बना पाते.
वे ज़मीन पर ,
जिंदा नहीं रह पाते .
अपना ,
अपने परिवार का ,
पेट नहीं भर पाते .

भ्रमित तू

आज मन मेरा उदास है ,
ढली उम्र के मन का प्रवास है !
यौवन मौजों का भटकाव भर ,
स्थायित्व कूलों के पास है !
भावना ,भंवर की डगमगाती नांव ,
जिंदगी आस्था है विश्वास है !
अंतहीन मंजिल का यह शरीर,
सराय सा ,अस्थाई आवास है !
जमीं पे लग रहा जो खेल ,
उसका मंच तो आकाश है !
अज्ञात के भय से भयभीत सब ,
अपने पर व्यंग है उपवास है !
ख़ुशी ,उसकी कल्पना ,संसार गढ़ लेना ,
एक जिंदगी जीने का प्रयास है !
'सत्य' उजाले कि की पीठ अँधेरा ,
भ्रमित तू खोजता प्रकाश है !...

गुंडत्व का बोझ

विवशता में किये ,
समझौते के दर्द को ,
जो सहजता से छिपा लेता है 
अभिजात्य मुस्कान के 
जितने सुंदर आवरण में ,
वह -
उतना ही व्यावहारिक है ,
कुशल कलाकार है .
देखने सुनने में प्रायः यही आता है
समझौते के लिए विवश ,
गरीब होता है ,
कमजोर होता है ,
चाहे ........
बल से हो,बुद्धी से या धन से ,
गुंडत्व का बोझ
अक्सर शरीफ ढोता है .

आत्म तत्त्व

यह जग केवल भावना ,किसने जाना सत्य 
परमार्थ भी भाव है ,यह आत्म तत्त्व ही नित्य !

निश्चय भाव सब आत्मा ,जब होता है व्याप्त !
मैं हूँ या हूँ नहीं ,होते भेद समाप्त !!

द्वन्द मुक्त योगी सदा ,शांत करे विश्राम !
अर्थहीन उसके लिए ,धर्मं ,मोक्ष व काम !!

अपने को खो देते हैं

प्राय: हम , 
भौतिक सम्पन्नता की चाह में , 
अपने को खो देते हैं ! 
यह कथित सम्पन्नता , 
दूसरों में प्रेम नहीं , 
इर्षा जगाती है ! 
अपने साथ अपने खोने का 
भय लाती है ! 
दूसरी ओर अपनत्व का भाव ,
प्रेम की सम्पन्नता ,
निडर बनाती है !
अभय जीना ही ,
जीवन की सार्थकता है ,
इसे
किसी भी परिस्थिति में मत खोना ,
हमेशा ,
अपने होकर रहना ;
निडर होकर जीना !!

सब एक दूसरे को छल रहे हैं

तुम्हारा ये प्रश्न -
गाँव की अमराइयां कहाँ गयी !
बैठकर जहाँ पर,
अपनत्व की छाँव में ,
मिटा लिया करते थे अपनी थकान ,
कैसे बदल गए पक्की कोठियों में 
कच्चे मकान !
* * * * * * * * *
मित्र -
तुम विदेश जा बसे हो !
तुम्हारे अन्दर औपचारिक अपनत्व शेष है !
हमारे लिए ,
यही क्या कम एहसान है ,
तुम्हारा यह पत्र ,
इसका प्रमाण है !
तुमने पूछा है !
सत्य बताये देता हूँ !
किस्सा तो लम्बा है !
सक्षेप में सुना देता हूँ -
इस देश में ,
एक व्यापारी आया था ,
अपने साथ अविवाहित ,
अत्यंत लुभावनी
तीन कन्यायें लाया था ,
बड़ी "प्रगति " थी !
हमें मूर्ख,अनपढ़ गंवार बताती थी ,
सुख ,सुविधाओं के नए- नए ,
सपने दिखाती थी !
मंझली ,
आधुनिकता थी ,
जिसने ,अपने आप को
अजब तरह से सजाया था !
अपने अधरों पर अमृत बताया था !
सबसे छोटी ,
नटखट ,व्यवहार में खोटी ,
नीति थी
अशरीरी
केवल प्रतीति थी !
यहाँ आकर ,
सबको टोहने लगी !
अपनी अदाओं से ,
सबको मोहने लगी !
कन्यायें धन की दीवानी थी ,
तीनों पर चढी जवानी थी ,
लोग धीरे-धीरे इनके दीवाने हुए,
बेटे ,बाप से ,
भाई ,भाई से बेगाने हुए !
सबके सब,
इनके चक्कर में आ गए ,
प्रेमांध ,
आपस में टकरा गए !
तीनों प्यासी हैं ,
इनकी प्यास नहीं बुझती ,
कौन ,शहर गाँव है
जहाँ य़े नहीं मिलती !
इन्होने हर नौजवान को बिगाड़ दिया है ,
राम-कृष्ण ,
सीता,राधा के देश को,
इन सूर्पनखाओं ने उजाड़ दिया है !
चारों ओर,
"वयं रक्षाम: " का शोर लगता है ,
फिर से इस देश में
शुक्र शिष्यों का जोर लगता है !
आजकल सब ,
इनकी चर्चाओं में जीते हैं ,
इनके विरह में ,
सोम रस पीते हैं !
जो भी कराता है इन दीवानों को
दीवानगी का बोध ,
मिलकर करते हैं,
वे सब उसका विरोध !
उस स्पष्टवादी -मुंहफट को
वे लोग सांप्रदायिक बताते हैं ,
प्रदर्शन करते हैं ,
झंडे-डंडे उठाते हैं !
ये कन्यायें ,
झोंपड़ी में नहीं रहती !
इनके लिए मकान पक्के बन रहे हैं ,
बोये जा रहे हैं बबूल
आम कट रहे हैं !
* * * * * * * * *
तुमने भी तो
इसी कारण गाँव छोड़ा था !
हम गंवारों से ,
अपना मुख मोड़ा था !
शायद विदेश से ,
दिल भर गया है ,
या कोई नासूर ,
घर कर गया है !
एक बार स्वयं आओ ,
हम कितने बदल गए हैं देख जाओ !
हमें हमारी संस्कृति,
बाहर वाले बताते हैं !
अपनी सभ्यता की पुस्तक
हम विदेशों से मंगाते हैं !
हिन्दुस्तान में ,
हिन्दू शब्द गाली है -
खेत को खा रहा ,
खेत का माली है !
कुछ पुरातन पंथियों की आवाज़ ,
नक्कार खाने में तूती की तरह ,
कोई नहीं सुनता ,
रेडियो-टी.वी. ,पत्र समाचार ,
सबका यही है विचार ,
सब ठीक-ठाक है ,
स्थिति नियंत्रण में है !
हमारा भला ,
विदेशी निमंत्रण में है !
गांधीजी के तीन बंदरों के ,
भावार्थ बदल गए हैं ,
न सुनने ,देखने,बोलने में भला है ,
जीवन शांत जीने की यह एक कला है !
हम जैसे कुछ लोग ,
बैठे हाथ मल रहे हैं !
सब एक दूसरे को छल रहे हैं !
* * * * * * * * *
भैया ,
ऐसे प्रश्नों से ,
मेरा दर्द न कुरेदा करो !
उत्तर के लिए विवश कर,
मेरा मर्म न भेदा करो !!

स्वानुभूति

शिशु समान जो कर रहे ,जग में आ व्यवहार 
उन्हें नहीं अवसाद है ,नहीं कोई त्यौहार ! 

पाने की आशा संजो ,जो करते हैं त्याग 
अपरिग्रह को मूढ़ जन ,कहते हैं वैराग ! 

जो रहता है एक रस ,सभी इन्द्रिय ज्ञान 
दूर हुई बाधा सभी ,दूर हुए सब त्राण ! 

सुना न पुस्तक से पढ़ा, बुद्धि किया प्रत्यक्ष
स्वानुभूति का विषय ,अनुभव किया प्रत्यक्ष !

"अस्तित्व चबा जायेगा "

लो ढाल दो 
फौलाद की भांति 
इंसान को कारखानों में 
सभ्यता के नाम पर
ब्रेन वाश कर 
बुद्धि की जो बात करे 
उसकी तलाश कर 
लटका दो सूली पर
चूंकि ,
आज सबका अस्तित्व टिका है
कुछ मनचलों की
तूलियों पर,
यदि
कहीं बुद्धि शेष रह गयी
बहुत चालाक है
किसी भी वेश रह गयी
इन मनचलों को जीने न देगी
खून को मधु समझ
पीने न देगी ,
बुद्धि न्याय की पक्षपाती है
तुम स्वार्थी अन्यायी हो
आदमी को आदमी की भांति
जीने नहीं देते
अपने ही कर्म फल का अमृत
पीने नहीं देते
इश्वर विश्वास है
जो पूछते हैं कहाँ है
उन्ही के सामने आ जायेगा
सुदर्शन घूमेगा
इनका अस्तित्व चबा जायेगा !

हेतुहेतुमदभाव

हेतुहेतुमदभाव-एक अनुभव युक्त सत्य है !
अतः आदमी ने अपनी कल्पना से 
जब गढ़ा चमत्कारी ईश्वर
जिसे सभी मानें 
वन्दनीय /पूजनीय /प्रशंसनीय 
तब स्वाभाविक ही अपने कार्य -कारण में 
सामंजस्य / समीकरण हेतु 
आदमी की अपेक्षा भी 
चिचोरी की हो जाती है !
चमत्कारी कहलाये जाने की लालसा में
उसकी कर्मठता / जूझने की क्षमता
भाग्यवाद में खो जाती है !!

दाम जो भी मिल जाये

मित्रों,
अगर यह कलाकार 
भावना के चित्र बनाये ,
क्या ओढ़े ,क्या बिछाये,
तथा क्या खाए !
इसलिए आजकल मैं,
अपने गुरुजनों के,
विश्वास को पी रहा हूँ !
उनके आदर्शों के महल को ,
जान-बूझ कर तोड़ ,
एक लाश की भांति जी रहा हूँ !
सुखी न सही ,
सुविधा से जी रहा हूँ !
यहाँ ,
पग पग पर पड़ा प्रमाण है !
सुख से अधिक ,
सुविधा का मान है !
* * * * * * * * * *
मैं भी हूँ ,
इसी समाज का अंग,
मैं रह सकता हूँ ,किन्तु-
बच्चों को कैसे रखूं तंग !
इसलिए
जग में मान पाने को
साधन जुटाने को
स्वार्थ की तूलिका से
करता हूँ चित्रित -
आलिंगन के दृश्य ,
कामिनी की अंगड़ाइयाँ,
घाट पर नहाती नायिका ,
वस्त्र पहनती -उतारती नवयोवना,
अठखेली करते
कामातुर नर-नार !
यद्यपि हृदय में चुभती रहती है
आस्था की कटार
लहू को आंसुओं में घोलता हूँ
रंग कितने मूल्य का हुआ
तोलता हूँ
मैं सत्य से परिचित
भूख को जानता हूँ
गरीबी के अभिशाप को पहचानता हूँ
भावना को खूंटी पे टांग
बिकने खड़ा हूँ
दाम जो भी मिल जाये
कभी नहीं अड़ा हूँ !!

सुदर्शन चक्रधारी भगवान चाहिए

पेट रोटी तन को परिधान चाहिए ,
सर ढकने को एक अदद छान चाहिए 
पेट की आग में जो जल रहे हैं लोग 
चाहिए रोटी नहीं ईमान चाहिए !
खडग लिए लोग हों या वोट लिए भीड़ ,
कोई भी हो तंत्र ,परिणाम चाहिए !
खून मान धन से बड़ा संस्कार है ,
कर्ण से बड़ा और क्या प्रमाण चाहिए !
अणु-बम हाथ में ,उठाये हैं जो लोग ,
उनको कहाँ धरती आसमान चाहिए !
सहन शक्ति की भी कोई सीमा होती है ,
अन्याय जो मिटा सके ,इंसान चाहिए !
सत्य को दबाने वाली गोलियां नहीं ,
अमन चैन वाली हमको बाम चाहिए !
"सत्य " और नहीं सहा जाता अत्याचार ,
सुदर्शन चक्रधारी भगवान चाहिए !!--

मिला न कोई मित्र मुझे

सुख-सुविधाओं भोगों का ही दिखलाया है चित्र मुझे ,
अरे मोक्ष का पथ बतलाता मिला न कोई मित्र मुझे ,
राम बनाकर वन को भेजे ,ऐसे कितने पिता मिले ,
पहन के वल्कल साथ चले ,मिला न ऐसा मित्र मुझे ,
तरह तरह की खाल ओढ़कर ,चिडिया घर में बैठे लोग !
में भौचक्का देख रहा था ,कहने लगे विचित्र मुझे ,
खेल खेल में श्रापित होकर ,मैं मृत्यु को प्राप्त हुआ ,
कोई भगीरथ गंगा लाकर ,करदे आज पवित्र मुझे !
आज खेत को बागड़ खाती,कैसा युग का परिवर्तन ,
छल प्रपंच के ज्ञानी-ध्यानी ,समझाते हैं चरित्र मुझे !

मैं पागल हूँ

मैं पागल हूँ पागलपन के गीत सुनाता हूँ
मैं तो खंडित प्रतिमा पर ही अर्ध्य चढ़ाता हूँ !
कैसे विस्मृत उनका जीवन ,
जिनसे यह इतिहास बना
रक्त से जिनके सिंचित हो
यह वृक्ष बना फिर बीज बना !
बलिदानों से लिखे हुए जो
मैंवह शिलालेख पढता हूँ
पुरातत्व की रक्षा करने ,
मैं जीवन अर्पण करता हूँ
में मरघट का वासी हूँ शमशान जगाता हूँ
खप्पर भरके पागलपन के गीत रचाता हूँ
मैं परवाह नहीं करता यह ,
लोग मुझे क्या कहते हैं !
जनसमूह उफनाती नदियाँ
कितने बहते निरते हैं
शक्ति से विश्वास हटा है
जब गरीब की कुटिया में
नियम मान्यता ,धर्मं कर्म जब
बांध धरे जग गठिया में
खंड-खंड जब बिखर रही हो सृष्टि में युग का सपना
आकाश भूमि से युग चेतना की शक्ति जगाता हूँ
मैं पागल हूँ पागलपन के गीत बनाता हूँ !
मैं तो खंडित प्रतिमा पर ही अर्ध्य चढ़ाता हूँ !
कैसे विस्मृत उनका जीवन ,
जिनसे यह इतिहास बना
होकर रक्त से जिनके सिंचित हो ,
यह वृक्ष बना फिर बीज बना
बलिदानों से लिखे हुए जो
मैं वह शिलालेख पढता हूँ
पुरातत्व की रक्षा करने ,
मैं जीवन अर्पण करता हूँ
मैं मरघट का वासी हूँ शमशान जगाता हूँ ...
खप्पर भरता पागलपन के गीत रचाता हूँ .......

"जिंदगी अनुताप है !"

यह सृजन है या सृजन के नाम पर अभिशाप है , 
अर्ध्य देते आ रहे हम अर्चना का ! 
कब हुआ अहसास उनको वेदना का ! 
स्वप्न ही देकर विरासत चल दिए , 
कब हुआ अहसास उनको कल्पना का ! 
आग में हमको जलाकर कह रहे कंचन बनोगे , 
भावना से भ्रमित बुद्धि जिंदगी का श्राप है ! 
स्वार्थ का बहरुपियापन रच रहा प्रवंचना , 
ॐ बनकर जी रही आज जग आराधना !
प्रकृति का बनकर पुजारी स्वयं को ही छल रहा ,
पूर्व बलि के हो रही हो सृष्टि की ज्यों वेदना !
सृष्टिकर्ता ही बना हो मृत्यु का हथियार जब ,
मृत्यु है जीवन वहां पर ,जिंदगी अनुताप है !

"कौन कहेगा "

तुम्हें निमंत्रण भेज दिया यदि ,
बिना बुलाये आने को फिर कौन रहेगा !...........
जान बूझ कर नहीं लिखा है ,
स्मृति को तुम दोष न देना !
मेरे पहले ही अनुभव की ,
उत्सुकता को कुचल न देना !
व्यवहारों से नहीं आंकना 
अपनेपन के इस परिचय को ,
अपनेपन पर नहीं अन्यथा ,
यहाँ कौन विश्वास करेगा !................
नींव यदि विश्वास नहीं है ,
हैं वे कैसे रिश्ते नाते !
केवल नए नए परिचय में ,
प्रचलित नियम निभाए जाते !
अगर तुम्हारे भी शब्दों को ,
मैं शंकित भावों से परखूँ
मेरी वाणी को बतलाओ ,
स्वर देने को कौन रहेगा ,.......
धरा निमंत्रण नहीं भेजती ,
स्वागत -आगत अलग बात है ,
तन का आना क्या आना है ,
मन का आना अलग बात है !
अगर तुम्हारे भी आने पर ,
द्वार खोलकर रखूँगा मैं ,
दस्तक दरवाजे पर देकर ,
आने को फिर कौन कहेगा !....................

भ्रमित तू खोजता प्रकाश

आज मन मेरा उदास है ,
ढली उम्र के मन का प्रवास है !
यौवन मौजों का भटकाव भर ,
स्थायित्व कूलों के पास है !
भावना ,भंवर की डगमगाती नांव ,
जिंदगी आस्था है विश्वास है !
अंतहीन मंजिल का यह शरीर,
सराय सा ,अस्थाई आवास है !
जमीं पे लग रहा जो खेल ,
उसका मंच तो आकाश है !
अज्ञात के भय से भयभीत सब ,
अपने पर व्यंग है उपवास है !
ख़ुशी ,उसकी कल्पना ,संसार गढ़ लेना ,
एक जिंदगी जीने का प्रयास है !
'सत्य' उजाले कि की पीठ अँधेरा ,
भ्रमित तू खोजता प्रकाश है !...

"समर्पण "

जब जब गहन वेदना होती 
तब मौन अधर होते हैं !
अंगारे जिनका सम्बन्धी 
शूलों से जिनका नाता है !
नहीं वहां आक्रोश पनपता ,
नहीं आँख आंसू लाती है !
तूफानों में पले-बढे जो ,
उनके सहज डगर होते हैं !.......
हँसते हँसते जो मर सकते ,
जीवन तो उनका जीना है !
अमृत के लोभी को अक्सर ,
पड़ा हलाहल ही पीना है !
जग को राह दिखने वाले ,
स्वयं दीप्त दिनकर होते हैं !..........
जलने में भी सोच रहे तुम ,
काठ चीड का या चन्दन का !
भाव समर्पण का होना है ,
या कोई भी हो वंदन का !
जितना शांत ह्रदय होता है ,
उतने वार प्रखर होते हैं !.............

झूठे आदर्शों के बोझ

मोह,लोभ, काम से 
विक्षिप्त समाज में ,
अहिंसा क्या कर पाती है !
शांति के नाम पर,
चादर तान सो जाती है !
जो कल्पना से संसार में जीते हैं ,
जीते रहें ,
हम झूठे आदर्शों के बोझ ,
कब तक सहें !
यूँ तो कितने ही अवतार आये
कौन क्या कर पाए अमर ,
राम ,कृष्ण ही हो पाए !
जो भी दुष्ट दमन को खड़ा होता है ,
वही अनुकरणीय बड़ा होता है !
अनुनय विनय से कब दुष्टता रूकती है !
वह शास्त्र से नहीं शास्त्र से झुकती है !
उन छद्म अहिन्सकों से ,
जो अपनी नपुंसकता छुपाते हैं !
हिंसक अच्छे हैं ,
जो मानवता बचाते हैं !
यह मात्र विद्रोह नहीं ,
विचारणीय सवाल है ,
सतयुग से अब तक का इतिहास ,
इसकी मिसाल है !

भटक रहा हूँ .

मैं युग-युग से भटक रहा हूँ ! 
जिज्ञासा को प्रश्न बनाकर 
प्रतिउत्तर सौ उत्तर पाकर 
अभी नहीं संतुष्ट हुआ हूँ 
मैं युग-युग से भटक रहा हूँ ........ 
जैसा जो करता भरता है ! 
पाप-पुण्य संचित करता है ! 
कौन परीक्षा,क्या अंतर है 
स्पष्ट नहीं कोई करता है !
कर्म जहाँ है ,फल है निश्चित
है क्रिया सभी प्रतिक्रिया
फिर पूजा यह कर्म-कांड क्या
बदल नहीं सकता जब किंचित
मेरी चाहत अंत खोजकर
जो जाने वह संत खोजकर
संतुष्टि को जिज्ञासा को
मैं युग-युग से भटक रहा हूँ ....
कुछ कहते चातक पागल है
व्यर्थ कूकती बन कोयल है
चातक व्यर्थ विरह सहता है
व्यर्थ सीप ,स्वांति कायल है
भौंरे का झूठा है गुंजन
मधु-मक्खी की झूठी भिन्न-भिन्न
सत्य नहीं निर्झर की कलकल
धरती-अम्बर का आलिंगन
इसको सत्य मर्म कहते हैं
कुछ जीवन को भ्रम कहते हैं
निराकार-साकार पूजकर
हो त्रिशंकु सा लटक रहा हूँ .....
मैं क्या हूँ जब से यह सोचा
मुझे नए प्रश्न ने कोंचा
क्या होता "मैं" मृत शरीर में
अभी नहीं उत्तर तक पहुंचा
"मैं" जो भी हो देह नहीं है
नहीं विरक्ति नेह नहीं है
भाव चार से तीन गुणों से
पञ्च ज्ञान से ज्ञेय नहीं है
बैठ गया हूँ मैं अब थक कर
राह एक अपने मन चुनकर
तू तो एक माध्यम भर है
भ्रम चेतन का पाला क्यों कर
जिसकी है जिज्ञासा उसको
दे अपने को भटक रहा हूँ ...........

"मौन स्वर "

गूंज रहा अपरिभाषित मेरे उर में कोई स्वर 
मन आकुल व्याकुल लगता है 
विश्वास नयन पंगुल लगता है !
दिशाओं में मौन मुखर है 
नभ मुझको खंखल लगता है !
इस शरीर में रहकर भी कुछ अलग अलग यूँ गीत ,
अर्थहीन शब्द खोजता कैसे जुड़ गए अधर !
मृदु मुस्कान अधर पर रखकर !
अभिव्यक्ति बन जाती छुपकर !
सत्य जानकर भी विछोह का ,
प्राण शेष आशा से भरकर !
जुड़ न पा रहा सांस-साँस से वृथा लगें प्रयास
स्पन्दनहीन ,स्वर विहीन ,ये घर हो जाना खँडहर !
क्यों विनती न जा ठुकरा कर !
क्या सपने में स्वप्न सजाकर !
जाना निश्चय आज नहीं कल ,
है जग में आना फिर फिर कर ,
बंधन -बंधन जप कर मान लिया है बंधन ,
झरकर नीचे आ जाता है ,चढ़ता जो अम्बर पर !

मैं पतली सी धार नदी की

मैं पतली सी धार नदी की गहराई को क्या पहचानूँ !
मेरे अंतर प्रेम ,ह्रदय के कुटिल भाव को मैं क्या जानूँ !

वैसे कहते लोग कि मैने,
चीर दिया धरती का आँचल ,
मुझ से ही है जीत न पाया ,
कोई गिरिवर या कि हिमांचल ,
अम्बर पर छाये टुकड़ों में
चीर दिए हैं मैने बादल,
हर प्राणी कहते उत्सुक हैं
सुनने को मेरी ध्वनि कल कल
पितृ गृह से जब निकली थी
धवल बनी कितनी ,कितनी थी निर्मल
बढ़ता गया गरल ही मुझसे
माना पछताई में पल पल
आखिर मुझको ले ही डूबा
लगता है जो सागर निश्छल
ह्रदय दग्ध दिखलाऊँ किसको ,किसे पराया अपना मानू !
पथ साथी सब मिले लुटेरे
मान के प्रेमी गले लगाया
दोनों ही हाथों से लूटा
तन मन अन्दर जो भी पाया
सबने मुझको किया लांछित ,
देख जगत को मन भरमाया !
मैने सबके पाप समेटे
जो भी जितना संग ले आया
अस्तित्व मिटाया मैने अपना
तभी सिन्धु ने गौरव पाया
सुनी व्यथा पर दर्द न जाना ,
बोलो कैसे व्यथा बखानूं !!

तुम भी शंकर बन सकते हो !

यदि तुम विष पी सकते हो तो ,
तुम भी शंकर बन सकते हो !

तुम्ही बताओ कौन बात में
शिव हम तुम से न्यारे थे ?
फिर भी वे तैंतीस कोटि 
देवों के अति प्यारे थे !

जीवन गरल प्रत्येक देव का ,
अपने प्याले में डाला ,
चेहरे पर मुस्कान बिखेरी ,
पी डाला भरकर प्याला !

विषम परिस्थिति में यदि तुम भी ,
मानव को सहयोग करो ,
नूतन गंगा बह सकती है ,
तुम भी शंकर बन सकते हो !

देव दनुज में है समरसता ,
वे सबको देते वरदान ,
यदा कदा तो स्वयं उन्ही के ,
पड़ जाते संकट में प्राण !

अवढर दानी जीवन उनका ,
बांधे कटी में मृग छाला ,
त्रिशूल हाथ में नृत्य तांडव ,
फिर भी है भोला भला !

दुश्मन को सर्पों जैसा तुम
जिस दिन कंठ लगा लोगे ,
हर जन करे तुम्हारी पूजा
तुम भी शंकर बन सकते हो !

स्वाभिमान के बनो हिमालय
राख राम अपने तन में ,
देने में तुम बनो देवता ,
हरी नाम जपकर मन में !

एक हाथ में सत्य अहिंसा
एक हाथ में ले त्रिशूल
एक पाँव हो प्रगति पथ पर
और दूसरा दुष्ट समूल !

जन जन की आशाएं पुष्पित
यदि जीवन में कर सकते
रुढी रीतियों का विनाश कर
तुम भी शंकर बन सकते हो

"मेरी एक गीतिका "

हमारी एक ख्वाहिश है  एक  ज़माने से
वोह हमें छू तो लें ,कोई भी बहाने से
एक बार दीवानापन उनपे छा जाये ,
हम शमा से जल रहे हैं होश में आने से
में अपनी हया  छोड़  भी दूँ ,क्या हांसिल  है
वोह भी तोह बाज़ आयें बार बार शर्माने से
हमने तो अपनी हस्ती पूरी तरह मिटा दी है
आप और क्या उम्मीद रखते हैं परवाने से !
"सत्य " यह वह आतिश है ,बिना लगाये लगती है ,
दस्तूरे इश्क आता नहीं सिखाने से !!

अनुबंध !

तन का हो ,
मन का हो ,
या बुद्धि का ,
साज ,संवार ,निखार
बहुधा अपने लिए नहीं होता ! यह सब प्रतीक है ध्यानाकर्षण का , हमारी बिकाऊ प्रवृत्ति का ....
प्रगति के नाम पर,
गाँव ,
शहरों की ओर दौड़ रहा ,
खेत -खलिहान
रिश्ते नातों को छोड़ रहा है ! करियर की धुन में ,
लग गया है घुन -तन में ,मन में , एक तरफ बीबी कमाऊ चाहिए ,
तो दूसरी ओर
मियां ऊंचे दामों पर बिकाऊ चाहिए , दोनों बिक रहे हैं ,
दफ्तर बाज़ारों में ,
दासता की हाट में ,
धन के विचारों में /
आज के रिश्तों में ,
धन के बंध हैं ,
आपस के सम्बन्ध
केवल अनुबंध हैं !
----------------------
हम ,
व्यवहार में भौतिकवादी हो गए हैं याने आचरण से शहरी हो गए हैं / शहरी सम्बन्ध निबाहे जाते हैं तन की तंदरुस्ती तक ,
साब के दाब तक ,
पद के रौब तक /
स्वार्थ के ख्वाब तक / वर्तमान में कहीं खो गए हैं वे भोले रिश्ते ,
जो जुड़े रहते थे ,
सांसों से सांसों तक , श्वांसों के बाद तक /
कहाँ खो गया
अनटूटे /
अपरिवर्तित /
भरे-पूरे परिवार का सपना // दीवारें भले टूटी थी
खपरेल भले फूटे थे ,
किन्तु -
हर ख़ुशी हर गम में
ज्यादा में /कम में
साथ निबाहा था हमने /
पर अब प्रगति के नाम पर
और छलकते जाम पर
शहर बनाने में जुटे हैं ,
पता नहीं कुछ पाया है
या अपने पास का भी गँवा कर
आज हम अब लुटे लुटे हैं /